Wednesday, 15 May 2013

सिर्फ बातों से बात नहीं बनने वाली !

   कुछ दिनों से टी.वी. पर समाचार देखने में घबराहट होने लगी है ! वजह है लगातार बढ़ती जा रहीं यौन अपराधों की ख़बरें ! ख़बरों से लगता है कि देश में दरिन्दे भरे पड़े हैं और कोई बेटी सुरक्षित नहीं है , मगर सोचने की बात यह है कि हमारे बीच ये दरिन्दे आते कहाँ से हैं ! इस सोच के बीच एक खबर का एक अंश बार-बार मेरी चेतना से टकराता है " उन दोनों ने पहले शराब पी फिर अश्लील फिल्म देखी ! नशे और अश्लीलता के जूनून ने विवेक और मानवता को समाप्त कर दिया ! उन्होंने घर के पास खेल रही अबोध बच्ची को देखा और.....
   एक और खबर लगातार दिमाग से टकराती है कि दरिंदगी की शिकार ऐसी ही एक मासूम के हत्यारों को गिरफ्तार करने की मांग कर रहे लोगों पर पुलिस की लाठियां बरसीं ! महिलाओं को घसीटा गया और बच्ची के परिजनों पर दबाव बनाया गया कि वे मुआवजा लेकर चुप बैठ जाएँ ! ऐसा करने वाले पुलिसकर्मी शराब पिए हुए थे और अश्लील गालियाँ बक रहे थे !
    माननीय प्रधानमंत्री महोदय बोले कि समाज को अपने भीतर झाँकने की जरूरत है जबकि सच तो सबके सामने उधड़ा पड़ा है कि नारी समाज के साथ हो रहे अपराधों की वजह "नशे" और "अश्लीलता" का कारोबार है ! लगभग हर यौन अपराध की तह में यही कारण हैं ! क्या प्रधानमंत्री इन कारणों को रोकने का सहस करने को तैयार हैं ???
   सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी भाव-भरे बयान और कड़ी कार्रवाई के आश्वासन दिए मगर उनकी नाक के नीचे राजधानी के तमाम बाजारों में अश्लील साहित्य और फिल्मों का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है उस पर कब लगाम लगेगी ???
   मीडिया इस मुद्दे को बार-बार उठाकर हमारे सामने ला रहा है मगर इनके चैनलों पर भी विरोधाभास देखने को मिलता है ! बुद्धिजीवियों द्वारा इन अपराधों के मनोवैज्ञानिक , सामाजिक आर्थिक कारणों पर गरमागरम बहसों के बीच दो मिनट के ब्रेक के दौरान स्क्रीन पर किसी परफ्यूम का विज्ञापन होता है जिसमें एक खास परफ्यूम लगाते ही कई लड़कियां सुधबुध खो बैठती हैं और अश्लील हरकतें करती हैं ! किसी साबुन के विज्ञापन में साबुन के बारे तो कुछ नहीं बताया जाता सिर्फ जनाना जिस्म की नुमायश की जाती है ! एक आम वाले शीतल पेय के विज्ञापन में अभिनेत्री बेवजह ऐसे एक्सप्रेशन देती देती है कि विज्ञापन उसके होठों का हो जाता है ! मतलब टी.वी. पर चल रही बहस और इस दो मिनट के ब्रेक में दिखाई जा रही सामग्री में कोई समन्वय नहीं..! इन मुद्दों पर बात करते समय मीडिया जिस गंभीर संवेदनशीलता का अभिनय करता क्या अश्लील विज्ञापन न दिखाने का फैसला ले सकता है ! या फिर बेटियों की आबरू भी इन के लिए टी.आर.पी. बढाने का साधन भर है ??
   तमाम फ़िल्मी और टी.वी. सितारे भी ऑनस्क्रीन नारी सम्मान के प्रति बहुत ही भावुक टिप्पणियां करते दिख रहे हैं और कई बार तो उनका गला और आँखें भी भर आती हैं ! क्या ये लोग चिकनी चमेली, शीला की जवानी , मुन्नी बदनाम , बीड़ी जलाई ले जैसे गानों और अश्लीलता से भरी फिल्मों को नष्ट करने का काम कर सकते हैं ???
   किसी से पूछने और जवाब मांगने की जरूरत नहीं है ! हमारे पास जवाब है की " नहीं " सरकारें, मीडिया, बुद्धिजीवी, फिल्म व टी.वी. उद्योग इन सभी की संवेदनाओं का स्तर कभी उन लोगों को नहीं छुएगा जो नशे और अश्लीलता के कारोबार से दौलत के महल बनाकर बैठे हैं क्योंकि इन सभी वर्गों के लोग इन महलों की सुविधा भोगते हैं !
    नशे और अश्लीलता का कारोबार अरबों रूपये का है और इसमें लगे हुए लोग एक तरफ तो अपनी तिजोरियां भरते हैं दूसरी तरफ भटके हुए, सिद्धांतविहीन नौजवान तैयार करके देश की नैतिकता को निकसान पहुंचाते हैं ! ऐसे युवा अपनी नशे की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपराधी बन जाते हैं और माफिया तथा राजनीतिक लोगों द्वारा इस्तेमाल किये जाते हैं और इनके लिए यह घ्रणित कारोबार दोहरा फायदा देता है !
   टी.वी. पर बैठे बुद्धिजीवी कहते हैं कि परिवार बच्चों को अच्छे संस्कार दे जिससे वे गलत कर्म न करें लेकिन प्रश्न यह भी है की क्या इंसान सिर्फ परिवार की सीमाओं में जी सकता है ?? घर में रखा टी.वी. परिवार के हिसाब से प्रसारण नहीं करता, पत्र-पत्रिकाएं और अखबार परिवार के हिसाब से नहीं छपता , इंटरनेट और मोबाइल पर सामग्री परिवार नहीं परोसता , नशे और अश्लीलता का उद्योग परिवार नहीं चलता इसलिए गलत संस्कारों के लिए परिवार नहीं बल्कि व्यवस्था की संचालक शक्तियां जिम्मेदार हैं ! पूरा समाज कभी भी साधू नहीं हो सकता इसलिए सामान्य लोगों को गलत सामग्रियों से बचाना सत्ता की जिम्मेदारी है ! और जो सत्ता इस जिम्मेदारी को उठाने के लायक नहीं उस सत्ता को पलट देना सामान्य लोगों की जिम्मेदारी है ! इस जिम्मेदारी को हम जितनी जल्दी पूरा कर लेंगे उतनी दामिनी और गुडिया को बचा पाएंगे ! व्यवस्था परिवर्तन के लिए तैयार रहो सिर्फ बातों से बात नहीं बनने वाली !     

Saturday, 7 July 2012

अख़बारों में आजकल हिग्स बोसोन की चर्चा जोरों पर है ! एक आम आदमी को लगता है कि पश्चिमी देशों का विज्ञान ईश्वर को खोजने में कामयाब होने वाला है ! 'ऐसा होने पर क्या होगा'  पर चर्चाएँ गर्म होने लगी हैं !

   ऐसे में एक सोच उठती है कि ईश्वर आखिर है क्या और इस दुनिया के इतिहास में उसका क्या योगदान है !

   भौतिक दुनिया और भौतिक शरीर को कम्प्यूटर के उदाहरण से समझते  हैं ! कम्प्यूटर का की-बोर्ड ,स्क्रीन,प्रिंटर,माउस,वेब-कैम,स्पीकर आदि शरीर के अंगों की तरह हैं जो सी.पी.यू. यानि दिमाग के निर्देशन पर बहुत से काम करते हैं जिनके बारे में हम सब जानते हैं ! यह सी पी यू अपने आप नहीं चलता,इसे चलाने के लिए इसमें ऑपरेटिंग सिस्टम लोड करना पड़ता है जिसका काम हमारे शरीर में आत्मा के जैसा है ! पूरी तरह तैयार कंप्यूटर को चलाने के लिए लगातार बिजली की जरुरत है तो इसी तरह इस शरीर को चलाने के लिए भी नियमित आहार की जरुरत है ! और आगे बात करें तो वायरस दोनों को बीमार करता है और एंटी वायरस दोनों को बीमारी से बचाता है, संक्षेप में हार्डवेयर शरीर और सॉफ्टवेयर आत्मा है !

   अब आते हैं ईश्वर पर ! कंप्यूटर की सहायता से चिकित्सा,शिक्षा और जीवन के अन्य क्षेत्रों में बेहद सकारात्मक बदलाव आये हैं और यह प्रक्रिया निरंतर जारी है लेकिन साथ ही कंप्यूटर के ही प्रयोग से बहुत से अपराध और अन्य मानवता विरोधी घिनौने कामों को अंजाम दिया जाता है ! ऐसा क्यों होता है ???

  जिस तरह कंप्यूटर पर होने वाले कार्य की प्रकृति यूजर की मर्जी से तय होती हैं उसी तरह इंसान के द्वारा किये जाने वाले कार्य की प्रकृति उसके विचार तय करते हैं ! जिन विचारों ने विभिन्न सभ्यताओं को पनपने और कायम रखने में अहम् भूमिका निभाई उनका संकलन धर्मग्रंथों के रूप में हमारे साथ है और जिन लोगों ने वे विचार दिए उन्हें सभ्यताओं ने ईश्वर का प्रतिनिधि माना ! मैं इस निकर्ष पर पहुंचा हूँ कि मानवता की भलाई  की भावना ही ईश्वर है जो हमारे हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर को कंट्रोल करती है जैसे हम अपने कंप्यूटर को कंट्रोल करते हैं ! एक दूसरी भावना भी है दुनिया में और उसके कार्य दुनिया को नुकसान पहुंचाते हैं ! धर्मग्रंथों के  अनुसार वह शैतान है !

  दोस्तों,एक कंप्यूटर यह तय नहीं करता कि यूजर कौन होगा लेकिन इंसान खुद तय कर सकता है कि अपना कंट्रोल किसके हाथ में रखना है ! अगर आपके जीवन से मानवता का फायदा हो रहा है तो आपका कंट्रोल ईश्वर के हाथ मैं है और अगर विपरीत है तो यूजर बदल डालो !

  अब बात करते हैं विज्ञान की...  विज्ञान एक प्रक्रिया है जिसमें परिकल्पना,प्रयोग,परिणाम और परिणामों की एकरूपता से प्रमाण मिलता है जिसे विशिष्ट ज्ञान या विज्ञान मान लिया जाता है ! हिग्स बोसोन की खोज इस दुनिया में पहले से मौजूद एक तत्व की खोज है जिसका निर्माण किन परिस्थितियों में संभव हुआ यह प्रयोग द्वारा स्थापित हुआ है जिसका ईश्वर से कोई वास्ता नहीं है क्योंकि ईश्वर तो एक विचार है, एक भावना है,एक विश्वास है जिसने मानव को आज तक कायम और एकजुट रखा है !

  आध्यात्म भी एक ज्ञान है जिसने हमें ईश्वर के अस्तित्व को मानना और एक समाज के रूप में रहना सिखाया है और इस ज्ञान के सहारे मानव सभ्यता ने हजारों वर्ष की अपनी यात्रा सफलता पूर्वक तय की है ! माना कि धर्मग्रंथों में लिखे कुछ प्रसंग काल्पनिक प्रतीत होते हैं लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि  धर्मग्रन्थ की रचना एक तत्कालीन व्यक्ति ने तत्कालीन परिस्थितियों में तत्कालीन समाज को ईश्वरीय विचारों की जानकारी देने के लिए की और यदि समाज आज कायम है तो उनका प्रयास सफल है !

  विज्ञान ने अपने कुछ सौ साल के इतिहास में मानव जाति का जितना भला किया है उससे कई गुना अधिक मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरे उत्पन्न किये हैं !हिग्स बोसोन की खोज पर बात करें तो जितने वैज्ञानिक,जितने संसाधन और जितना पैसा इस प्रयोग पर लगाया गया उतने में दुनिया के बहुत सारे लोगों की जिंदगी बेहतर बनाई जा सकती थी...इस दुनिया के कर्णधारों को सोचना चाहिए कि अधिक महत्वपूर्ण क्या है ????

   एक सवाल सारी दुनिया से :- विज्ञान का उपयोग इंसान के आज और आने वाले कल को बेहतर बनाने में होना चाहिए या फिर अतीत के सवालों पर माथापच्ची में ??????????????????????