कुछ दिनों से टी.वी. पर समाचार देखने में घबराहट होने लगी है ! वजह है लगातार बढ़ती जा रहीं यौन अपराधों की ख़बरें ! ख़बरों से लगता है कि देश में दरिन्दे भरे पड़े हैं और कोई बेटी सुरक्षित नहीं है , मगर सोचने की बात यह है कि हमारे बीच ये दरिन्दे आते कहाँ से हैं ! इस सोच के बीच एक खबर का एक अंश बार-बार मेरी चेतना से टकराता है " उन दोनों ने पहले शराब पी फिर अश्लील फिल्म देखी ! नशे और अश्लीलता के जूनून ने विवेक और मानवता को समाप्त कर दिया ! उन्होंने घर के पास खेल रही अबोध बच्ची को देखा और.....
एक और खबर लगातार दिमाग से टकराती है कि दरिंदगी की शिकार ऐसी ही एक मासूम के हत्यारों को गिरफ्तार करने की मांग कर रहे लोगों पर पुलिस की लाठियां बरसीं ! महिलाओं को घसीटा गया और बच्ची के परिजनों पर दबाव बनाया गया कि वे मुआवजा लेकर चुप बैठ जाएँ ! ऐसा करने वाले पुलिसकर्मी शराब पिए हुए थे और अश्लील गालियाँ बक रहे थे !
माननीय प्रधानमंत्री महोदय बोले कि समाज को अपने भीतर झाँकने की जरूरत है जबकि सच तो सबके सामने उधड़ा पड़ा है कि नारी समाज के साथ हो रहे अपराधों की वजह "नशे" और "अश्लीलता" का कारोबार है ! लगभग हर यौन अपराध की तह में यही कारण हैं ! क्या प्रधानमंत्री इन कारणों को रोकने का सहस करने को तैयार हैं ???
सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी भाव-भरे बयान और कड़ी कार्रवाई के आश्वासन दिए मगर उनकी नाक के नीचे राजधानी के तमाम बाजारों में अश्लील साहित्य और फिल्मों का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है उस पर कब लगाम लगेगी ???
मीडिया इस मुद्दे को बार-बार उठाकर हमारे सामने ला रहा है मगर इनके चैनलों पर भी विरोधाभास देखने को मिलता है ! बुद्धिजीवियों द्वारा इन अपराधों के मनोवैज्ञानिक , सामाजिक आर्थिक कारणों पर गरमागरम बहसों के बीच दो मिनट के ब्रेक के दौरान स्क्रीन पर किसी परफ्यूम का विज्ञापन होता है जिसमें एक खास परफ्यूम लगाते ही कई लड़कियां सुधबुध खो बैठती हैं और अश्लील हरकतें करती हैं ! किसी साबुन के विज्ञापन में साबुन के बारे तो कुछ नहीं बताया जाता सिर्फ जनाना जिस्म की नुमायश की जाती है ! एक आम वाले शीतल पेय के विज्ञापन में अभिनेत्री बेवजह ऐसे एक्सप्रेशन देती देती है कि विज्ञापन उसके होठों का हो जाता है ! मतलब टी.वी. पर चल रही बहस और इस दो मिनट के ब्रेक में दिखाई जा रही सामग्री में कोई समन्वय नहीं..! इन मुद्दों पर बात करते समय मीडिया जिस गंभीर संवेदनशीलता का अभिनय करता क्या अश्लील विज्ञापन न दिखाने का फैसला ले सकता है ! या फिर बेटियों की आबरू भी इन के लिए टी.आर.पी. बढाने का साधन भर है ??
तमाम फ़िल्मी और टी.वी. सितारे भी ऑनस्क्रीन नारी सम्मान के प्रति बहुत ही भावुक टिप्पणियां करते दिख रहे हैं और कई बार तो उनका गला और आँखें भी भर आती हैं ! क्या ये लोग चिकनी चमेली, शीला की जवानी , मुन्नी बदनाम , बीड़ी जलाई ले जैसे गानों और अश्लीलता से भरी फिल्मों को नष्ट करने का काम कर सकते हैं ???
किसी से पूछने और जवाब मांगने की जरूरत नहीं है ! हमारे पास जवाब है की " नहीं " सरकारें, मीडिया, बुद्धिजीवी, फिल्म व टी.वी. उद्योग इन सभी की संवेदनाओं का स्तर कभी उन लोगों को नहीं छुएगा जो नशे और अश्लीलता के कारोबार से दौलत के महल बनाकर बैठे हैं क्योंकि इन सभी वर्गों के लोग इन महलों की सुविधा भोगते हैं !
नशे और अश्लीलता का कारोबार अरबों रूपये का है और इसमें लगे हुए लोग एक तरफ तो अपनी तिजोरियां भरते हैं दूसरी तरफ भटके हुए, सिद्धांतविहीन नौजवान तैयार करके देश की नैतिकता को निकसान पहुंचाते हैं ! ऐसे युवा अपनी नशे की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपराधी बन जाते हैं और माफिया तथा राजनीतिक लोगों द्वारा इस्तेमाल किये जाते हैं और इनके लिए यह घ्रणित कारोबार दोहरा फायदा देता है !
टी.वी. पर बैठे बुद्धिजीवी कहते हैं कि परिवार बच्चों को अच्छे संस्कार दे जिससे वे गलत कर्म न करें लेकिन प्रश्न यह भी है की क्या इंसान सिर्फ परिवार की सीमाओं में जी सकता है ?? घर में रखा टी.वी. परिवार के हिसाब से प्रसारण नहीं करता, पत्र-पत्रिकाएं और अखबार परिवार के हिसाब से नहीं छपता , इंटरनेट और मोबाइल पर सामग्री परिवार नहीं परोसता , नशे और अश्लीलता का उद्योग परिवार नहीं चलता इसलिए गलत संस्कारों के लिए परिवार नहीं बल्कि व्यवस्था की संचालक शक्तियां जिम्मेदार हैं ! पूरा समाज कभी भी साधू नहीं हो सकता इसलिए सामान्य लोगों को गलत सामग्रियों से बचाना सत्ता की जिम्मेदारी है ! और जो सत्ता इस जिम्मेदारी को उठाने के लायक नहीं उस सत्ता को पलट देना सामान्य लोगों की जिम्मेदारी है ! इस जिम्मेदारी को हम जितनी जल्दी पूरा कर लेंगे उतनी दामिनी और गुडिया को बचा पाएंगे ! व्यवस्था परिवर्तन के लिए तैयार रहो सिर्फ बातों से बात नहीं बनने वाली !
एक और खबर लगातार दिमाग से टकराती है कि दरिंदगी की शिकार ऐसी ही एक मासूम के हत्यारों को गिरफ्तार करने की मांग कर रहे लोगों पर पुलिस की लाठियां बरसीं ! महिलाओं को घसीटा गया और बच्ची के परिजनों पर दबाव बनाया गया कि वे मुआवजा लेकर चुप बैठ जाएँ ! ऐसा करने वाले पुलिसकर्मी शराब पिए हुए थे और अश्लील गालियाँ बक रहे थे !
माननीय प्रधानमंत्री महोदय बोले कि समाज को अपने भीतर झाँकने की जरूरत है जबकि सच तो सबके सामने उधड़ा पड़ा है कि नारी समाज के साथ हो रहे अपराधों की वजह "नशे" और "अश्लीलता" का कारोबार है ! लगभग हर यौन अपराध की तह में यही कारण हैं ! क्या प्रधानमंत्री इन कारणों को रोकने का सहस करने को तैयार हैं ???
सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी भाव-भरे बयान और कड़ी कार्रवाई के आश्वासन दिए मगर उनकी नाक के नीचे राजधानी के तमाम बाजारों में अश्लील साहित्य और फिल्मों का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है उस पर कब लगाम लगेगी ???
मीडिया इस मुद्दे को बार-बार उठाकर हमारे सामने ला रहा है मगर इनके चैनलों पर भी विरोधाभास देखने को मिलता है ! बुद्धिजीवियों द्वारा इन अपराधों के मनोवैज्ञानिक , सामाजिक आर्थिक कारणों पर गरमागरम बहसों के बीच दो मिनट के ब्रेक के दौरान स्क्रीन पर किसी परफ्यूम का विज्ञापन होता है जिसमें एक खास परफ्यूम लगाते ही कई लड़कियां सुधबुध खो बैठती हैं और अश्लील हरकतें करती हैं ! किसी साबुन के विज्ञापन में साबुन के बारे तो कुछ नहीं बताया जाता सिर्फ जनाना जिस्म की नुमायश की जाती है ! एक आम वाले शीतल पेय के विज्ञापन में अभिनेत्री बेवजह ऐसे एक्सप्रेशन देती देती है कि विज्ञापन उसके होठों का हो जाता है ! मतलब टी.वी. पर चल रही बहस और इस दो मिनट के ब्रेक में दिखाई जा रही सामग्री में कोई समन्वय नहीं..! इन मुद्दों पर बात करते समय मीडिया जिस गंभीर संवेदनशीलता का अभिनय करता क्या अश्लील विज्ञापन न दिखाने का फैसला ले सकता है ! या फिर बेटियों की आबरू भी इन के लिए टी.आर.पी. बढाने का साधन भर है ??
तमाम फ़िल्मी और टी.वी. सितारे भी ऑनस्क्रीन नारी सम्मान के प्रति बहुत ही भावुक टिप्पणियां करते दिख रहे हैं और कई बार तो उनका गला और आँखें भी भर आती हैं ! क्या ये लोग चिकनी चमेली, शीला की जवानी , मुन्नी बदनाम , बीड़ी जलाई ले जैसे गानों और अश्लीलता से भरी फिल्मों को नष्ट करने का काम कर सकते हैं ???
किसी से पूछने और जवाब मांगने की जरूरत नहीं है ! हमारे पास जवाब है की " नहीं " सरकारें, मीडिया, बुद्धिजीवी, फिल्म व टी.वी. उद्योग इन सभी की संवेदनाओं का स्तर कभी उन लोगों को नहीं छुएगा जो नशे और अश्लीलता के कारोबार से दौलत के महल बनाकर बैठे हैं क्योंकि इन सभी वर्गों के लोग इन महलों की सुविधा भोगते हैं !
नशे और अश्लीलता का कारोबार अरबों रूपये का है और इसमें लगे हुए लोग एक तरफ तो अपनी तिजोरियां भरते हैं दूसरी तरफ भटके हुए, सिद्धांतविहीन नौजवान तैयार करके देश की नैतिकता को निकसान पहुंचाते हैं ! ऐसे युवा अपनी नशे की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपराधी बन जाते हैं और माफिया तथा राजनीतिक लोगों द्वारा इस्तेमाल किये जाते हैं और इनके लिए यह घ्रणित कारोबार दोहरा फायदा देता है !
टी.वी. पर बैठे बुद्धिजीवी कहते हैं कि परिवार बच्चों को अच्छे संस्कार दे जिससे वे गलत कर्म न करें लेकिन प्रश्न यह भी है की क्या इंसान सिर्फ परिवार की सीमाओं में जी सकता है ?? घर में रखा टी.वी. परिवार के हिसाब से प्रसारण नहीं करता, पत्र-पत्रिकाएं और अखबार परिवार के हिसाब से नहीं छपता , इंटरनेट और मोबाइल पर सामग्री परिवार नहीं परोसता , नशे और अश्लीलता का उद्योग परिवार नहीं चलता इसलिए गलत संस्कारों के लिए परिवार नहीं बल्कि व्यवस्था की संचालक शक्तियां जिम्मेदार हैं ! पूरा समाज कभी भी साधू नहीं हो सकता इसलिए सामान्य लोगों को गलत सामग्रियों से बचाना सत्ता की जिम्मेदारी है ! और जो सत्ता इस जिम्मेदारी को उठाने के लायक नहीं उस सत्ता को पलट देना सामान्य लोगों की जिम्मेदारी है ! इस जिम्मेदारी को हम जितनी जल्दी पूरा कर लेंगे उतनी दामिनी और गुडिया को बचा पाएंगे ! व्यवस्था परिवर्तन के लिए तैयार रहो सिर्फ बातों से बात नहीं बनने वाली !
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